अर्थ के फेर में अनर्थ होता समाज रिश्तों पर भारी पड़ता बैंक बैलेंस नाते, रिश्ते और दोस्ती सब बेकार हैं, केवल पैसा ही सर्वोपर
- अर्थ के फेर में अनर्थ होता समाज रिश्तों पर भारी पड़ता बैंक बैलेंस नाते, रिश्ते और दोस्ती सब बेकार हैं, केवल पैसा ही सर्वोपर
आज

ताने-बाने का सबसे सूक्ष्म निरीक्षण किया जाए, तो एक कड़वी हकीकत उभरकर सामने आती पैसा पूरी तरह हावी हो चुका है। ‘नाते, रिश्ते और दोस्ती सब बेकार हैं, केवल पैसा ही सर्वोपरि है’ यह विचार आज किसी एक व्यक्ति की हताशा नहीं, बल्कि समूचे आधुनिक समाज की सामूहिक मानसिकता का एक चिंताजनक प्रतिबिंब बन गया है। हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ व्यक्ति का मूल्यांकन उसके चरित्र, ज्ञान या आत्मीयता से नहीं, बल्कि उसके वित्तीय स्तर और दिखावे की क्षमता से होता है।
इस वैचारिक पतन का सबसे बड़ा कारण हमारी जीवनशैली का अत्यधिक बाज़ारीकरण है। आज बाज़ार ने रिश्तों को भी एक ‘इन्वेस्टमेंट’ निवेश बना दिया है। लोग अक्सर उन्हीं से हाथ मिलाना या संबंध रखना पसंद करते हैं, जिनसे भविष्य में किसी प्रकार का आर्थिक या व्यावसायिक लाभ मिलने की उम्मीद हो। निस्वार्थ प्रेम और सहयोग की जगह अब ‘उपयोगितावाद’ ने ले ली है। जब तक आपके पास धन और प्रभाव है, तब तक रिश्तों की महफिल सजी रहती है, और जैसे ही यह साधन कम होता है,अपने भी दूर खड़े नजर आते हैं।
सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि आज के दौर में बुनियादी जरूरतें जैसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा और एक सम्मानजनक जीवन इतनी महंगी हो चुकी हैं कि आम इंसान चौबीसों घंटे सिर्फ आर्थिक सुरक्षा की अंधी दौड़ में भागने को मजबूर है। इस अनवरत भागदौड़ ने इंसान से उसका मानसिक सुकून और अपनों के साथ बिताने वाला वह बहुमूल्य समय छीन लिया है, जो किसी भी रिश्ते को सींचने के लिए जरूरी होता है। संवादहीनता बढ़ रही है और सामूहिक परिवारों के बिखराव के बाद अब एकल परिवार भी बिखरने की कगार पर हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि आधुनिक जीवन को गरिमा के साथ जीने के लिए पैसा एक अनिवार्य साधन है। आर्थिक प्रगति समाज के विकास का पहिया है। लेकिन जब साधन ही साध्य बन जाए, तो सामाजिक ताना-बाना टूटना निश्चित है। हमें यह गहराई से समझना होगा कि पैसा भौतिक सुख और सुविधाएं तो खरीद सकता है, लेकिन संकट के समय सांत्वना देने वाले हाथ, बीमारी में बिना स्वार्थ के देखभाल करने वाले अपने और जीवन की तन्हाई को बांटने वाले सच्चे दोस्त किसी बाज़ार में नहीं बिकते।
समय आ गया है कि विकास की इस अंधी दौड़ में हम थोड़ा रुकें और अपनी प्राथमिकताओं का पुनर्मूल्यांकन करें। आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ नैतिक और पारिवारिक मूल्यों का संतुलन बनाना ही इस सदी की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि हम आज भी नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियों के पास बैंक खातों में धन तो अकूत होगा, लेकिन उस समृद्धि का उत्सव मनाने के लिए कोई ‘अपना’ मौजूद नहीं होगा।
