व्यवस्था की बेड़ियों और विरोधियों के चक्रव्यूह में जूझते सरपंच कैसे बदलेगी गांवों की सूरत
व्यवस्था की बेड़ियों और विरोधियों के चक्रव्यूह में जूझते सरपंच कैसे बदलेगी गांवों की सूरत
गांवों के विकास के लिए दिन-रात संघर्ष करने वाले सरपंच आज दोहरी लड़ाई लड़ रहे हैं एक तरफ प्रशासनिक सुस्ती और बजट की कमी, तो दूसरी तरफ बदलाव से डरने वाले राजनीतिक विरोधियों के जानलेवा हमले। यदि जमीनी स्तर पर लोकतंत्र के इस सबसे महत्वपूर्ण पद को सुरक्षा, स्वायत्तता और सम्मान नहीं मिला, तो ग्रामीण भारत का विकास केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएगा।
पंचायती राज व्यवस्था का मूल उद्देश्य सत्ता का विकेंद्रीकरण और गांवों का आत्मनिर्भर बनना था। इस व्यवस्था के केंद्र में होता है ‘सरपंच’। जब कोई सरपंच वास्तव में अपने गांव को एक ‘आदर्श ग्राम’ बनाने का सपना देखता है, तो उसका सफर फूलों की सेज नहीं बल्कि कांटों की राह बन जाता है। शिक्षा, पक्की सड़कें, शुद्ध पेयजल और युवाओं के लिए रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों को धरातल पर उतारने के लिए एक सच्चे जनप्रतिनिधि को हर कदम पर संघर्ष करना पड़ता है।
यह संघर्ष केवल सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने तक सीमित नहीं है। असली चुनौती तब शुरू होती है जब सरपंच गांव में पारदर्शिता लाने की कोशिश करता है। भ्रष्टाचार पर लगाम कसने और सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के प्रयास से उन बिचौलियों और रसूखदारों के पेट में दर्द होने लगता है, जो सालों से ग्रामीण बजट को अपनी जागीर समझते आए हैं। नतीजा यह होता है कि विकास के लिए संघर्षरत सरपंचों पर झूठे आरोप लगाए जाते हैं, प्रशासनिक बाधाएं खड़ी की जाती हैं और हद तो तब हो जाती है जब उन पर ताबड़तोड़ हिंसक हमले किए जाते हैं।
एक तरफ सरकार ‘डिजिटल विलेज’ और ‘स्मार्ट विलेज’ के बड़े-बड़े नारे लगाती है, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर काम करने वाले सरपंचों को बुनियादी फंड के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता है। ऊपर से विरोधियों का हिंसक दबाव उनके मनोबल को तोड़ता है। यह स्थिति न केवल एक चुने हुए जनप्रतिनिधि का अपमान है, बल्कि उस पूरे जनमत का मखौल है जिसने बदलाव के लिए वोट दिया था।
संघर्ष कर रहे सरपंचों के हाथों को मजबूत करना होगा
यदि हम वास्तव में गांवों का विकास चाहते हैं, तो हमें संघर्ष कर रहे सरपंचों के हाथों को मजबूत करना होगा। प्रशासन को चाहिए कि वह ऐसे जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और राजनीतिक द्वेष के कारण होने वाले हमलों पर त्वरित कानूनी कार्रवाई करे। लोकतंत्र की यह सबसे छोटी इकाई ही देश की प्रगति का आधार है। जब तक हर सरपंच निडर होकर काम नहीं कर पाएगा, तब तक ग्रामीण विकास की हर योजना अधूरी ही रहेगी
