पंचायत संपत्तियों पर चोट क्यों सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाना सीधे तौर पर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा
पंचायत संपत्तियों पर चोट क्यों सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाना सीधे तौर पर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा
ग्रामीण भारत की आत्मा और विकास की धुरी उसकी पंचायतें हैं। सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों के उत्थान के लिए सामुदायिक भवन, स्कूल, पंचायत घर, स्ट्रीट लाइटें, पेयजल टंकी, सार्वजनिक शौचालय और पार्क जैसी बुनियादी सुविधाओं का निर्माण कराया जाता है। यह संपत्तियां किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझी विरासत होती हैं। लेकिन अत्यंत चिंता का विषय है कि हाल के दिनों में पंचायतों की इन सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने, उन्हें तोड़ने या उन पर अवैध कब्जा करने की प्रवृत्तियां तेजी से बढ़ी हैं।
यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर लोग अपनी ही संपत्ति को नुकसान क्यों पहुँचाते हैं? और ऐसा करके उन्हें किस ‘लाभ’ की प्राप्ति होती है?
गहनता से विचार करें तो इसके पीछे कोई आर्थिक या तार्किक लाभ नहीं होता, बल्कि यह केवल मानसिक विकृति, आपसी रंजिश और राजनीतिक द्वेष का नतीजा होता है। अक्सर देखा जाता है कि पंचायत चुनावों की आपसी रंजिश के कारण पराजित पक्ष या विरोधी तत्व वर्तमान पंचायत द्वारा कराए गए विकास कार्यों जैसे- नवनिर्मित सड़कें, सौर ऊर्जा लाइटें या जल आपूर्ति केंद्र को नुकसान पहुँचाते हैं ताकि वर्तमान जन प्रतिनिधि को बदनाम किया जा सके। कुछ मामलों में लोग व्यक्तिगत स्वार्थ या अतिक्रमण की मंशा से सार्वजनिक भूमि पर बने ढांचों को क्षतिग्रस्त कर देते हैं। कुछ असामाजिक तत्व केवल क्षणिक आक्रोश या मनोरंजन के लिए भी ऐसा करते हैं।
जो लोग ऐसा करते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि इन संपत्तियों के निर्माण में लगने वाला पैसा किसी नेता या अधिकारी की जेब से नहीं, बल्कि आम जनता के खून-पसीने की कमाई टैक्स से आता है। जब एक स्ट्रीट लाइट तोड़ी जाती है, तो अंधेरा पूरे गांव में होता है; जब पेयजल की मोटरपंप या पाइपलाइन काटी जाती है, तो प्यासा पूरा गांव रहता है। ऐसे में सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाना सीधे तौर पर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। इससे किसी को कोई लाभ नहीं होता, बल्कि गांव का विकास कई वर्ष पीछे चला जाता है।
अब समय आ गया है कि इस प्रवृत्ति पर कड़ा अंकुश लगाया जाए। केवल कानून या पुलिस के भरोसे इस समस्या को हल नहीं
किया जा सकता। इसके लिए ग्रामीणों में ‘अपनत्व की भावना’ जगानी होगी। लोगों को यह समझना होगा कि सरकारी संपत्ति वास्तव में ‘हमारी अपनी संपत्ति’ है। पंचायतों को भी ग्राम सभाओं के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाने चाहिए। साथ ही, सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने वाले असामाजिक तत्वों को चिन्हित कर उन पर भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। गांव का विकास तभी संभव है जब हम विनाश की इस राजनीति और मानसिकता से ऊपर उठेंगे।
