पंचायतों में बढ़ता असंतोष आखिर क्यों निशाने पर हैं सरपंच
पंचायतों में बढ़ता असंतोष आखिर क्यों निशाने पर हैं सरपं
ग्रामीण विकास की धुरी कही जाने वाली पंचायती राज व्यवस्था आज एक नए दौर के संकट से गुजर रही है। देश के अमूमन हर राज्य से यह खबर आम हो चली है कि किसी न किसी गांव में सरपंच के खिलाफ ग्रामीणों या वार्ड पंचों ने मोर्चा खोल रखा है। कहीं अविश्वास प्रस्ताव लाए जा रहे हैं, तो कहीं भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाकर धरने-प्रदर्शन हो रहे हैं। लोकतंत्र की सबसे जमीनी इकाई यानी ग्राम पंचायत में सरपंचों का यह चौतरफा विरोध महज राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता नहीं है, बल्कि इसके पीछे व्यवस्थागत खामियां और जनता की बदलती अपेक्षाएं हैं।
गांवों में चुनावी गुटबाजी चुनाव खत्म होने के साथ खत्म नहीं होती। पराजित खेमा पूरे पांच साल सरपंच की कमियां ढूंढने और उसे पद से हटाने की साजिशों में लगा रहता है।
इस जमीनी खींचतान का सबसे बुरा असर गांव के विकास कार्यों पर पड़ रहा है। जब सरपंच और पंच आपस में ही लड़ते रहेंगे, तो स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, पक्की सड़कें और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं अधर में लटक जाती हैं। सरकारी बजट समय पर खर्च न होने के कारण लैप्स हो जाता है, जिससे नुकसान सिर्फ और सिर्फ आम जनता का होता है।
पंचायतों को इस राजनीति से उबारने के लिए सख्त प्रशासनिक निगरानी की जरूरत है।
