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अन्नदाता पर कुदरत की मार,अब सरकारी मरहम की दरकार - Somanshu News

अन्नदाता पर कुदरत की मार,अब सरकारी मरहम की दरकार


अन्नदाता पर कुदरत की मार,अब सरकारी मरहम की दरका

(रमेश साहू पत्रकार)

छत्तीसगढ़ को ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है, लेकिन आज यही कटोरा आंसुओं से भरता नजर आ रहा है। पिछले कुछ दिनों से प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में हुई बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी है। खेतों में पककर तैयार खड़ी धान की फसल और कटाई के बाद खलिहानों में रखी उपज पानी में डूब गई है। साल भर खून-पसीना बहाकर जिस सुनहरी फसल के घर आने का किसान इंतजार कर रहे थे, वह अब बर्बादी की कगार पर है।
मौसम का यह बदला मिजाज सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि यह हजारों किसान परिवारों के सपनों और उनकी आजीविका पर सीधा प्रहार है। छत्तीसगढ़ का किसान पहले से ही कर्ज, खाद-बीज की बढ़ती कीमतों और खेती की लागत से जूझ रहा है। ऐसे में ऐन वक्त पर हुई इस बेमौसम बारिश ने उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
भीगे हुए धान में अंकुरण होने और फसल के सड़ने का खतरा बढ़ गया है, जिससे बाजार या सोसायटियों में उसकी सही कीमत मिलना भी मुश्किल हो जाएगा।
इस संकट की घड़ी में सरकार और प्रशासन को बिना किसी देरी के बेहद संवेदनशील रुख अपनाना होगा। केवल घोषणाओं से काम नहीं चलेगा, बल्कि धरातल पर तुरंत कदम उठाने होंगे।

प्रशासन को तुरंत इन तीन मोर्चों पर काम करने की आवश्यकता है:

त्वरित गिरदावरी और सर्वे
राजस्व और कृषि विभाग के अधिकारी तत्काल खेतों में पहुंचें और बिना किसी कागजी लेत-लतीफी के नुकसान का सही आकलन करें।

फसल बीमा योजना और राजस्व पुस्तक परिपत्र (RBC 6-4) के तहत प्रभावित किसानों को जल्द से जल्द राहत राशि जारी की जाए।
सोसायटियों में धान खरीदी के दौरान नमी के नियमों में थोड़ी ढील दी जानी चाहिए, ताकि किसान अपनी भीगी हुई फसल को भी बेच सकें।
किसान सिर्फ अन्नदाता नहीं, हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। जब खेत समृद्ध होते हैं, तभी प्रदेश समृद्ध होता है। आज जब हमारा अन्नदाता संकट में है, तब सरकार, प्रशासन और समाज का यह कर्तव्य है कि वे उनके साथ खड़े हों। उम्मीद है कि सरकार इस स्थिति की गंभीरता को समझेगी और किसानों को इस आपदा से उबारने के लिए त्वरित और ठोस कदम उठाएगी, ताकि उनके चेहरों की चिंता दूर हो सके।


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