भ्रम की राजनीति जब भोली जनता के कंधे पर बंदूक रख टूटता है सरपंच का मनोबल
भ्रम की राजनीति जब भोली जनता के कंधे पर बंदूक रख टूटता है सरपंच का मनोब
ग्रामीण भारत आज भी देश की आत्मा है, और इस आत्मा को सशक्त बनाने की जिम्मेदारी जमीनी स्तर पर ‘पंचायती राज’ और ‘सरपंच’ के कंधों पर होती है। लेकिन हाल के दिनों में एक बेहद चिंताजनक प्रवृत्ति देखने को मिली है। गांवों में कुछ निहित स्वार्थी और विरोधी तत्व अपने राजनीतिक व व्यक्तिगत फायदों के लिए वहां की भोली-भाली और सीधी जनता को भड़काने का काम कर रहे हैं।
विकास कार्यों में पारदर्शिता लाने और नियमों का पालन करने वाले ईमानदार सरपंचों को इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। विरोधी तत्व विकास योजनाओं को लेकर जनता के बीच जानबूझकर अफवाहें फैलाते हैं, जिससे ग्रामीणों में अविश्वास की भावना पैदा होती है।
जब एक जनप्रतिनिधि (सरपंच) पूरे उत्साह के साथ गांव की सूरत बदलने का प्रयास करता है, और बदले में उसे अपनों से ही विरोध, झूठे आरोप और अविश्वास मिलता है, तो उसका मनोबल पूरी तरह टूट जाता है। यह स्थिति न सिर्फ उस सरपंच के प्रशासनिक साहस को कमजोर करती है, बल्कि पूरे गांव के विकास को कई साल पीछे धकेल देती है।
लोकतंत्र में रचनात्मक विरोध का स्वागत है, लेकिन व्यक्तिगत द्वेष के कारण जनता को गुमराह करना विकास विरोधी मानसिकता को दर्शाता है। अब समय आ गया है कि ग्रामीण जनता इन विरोधी तत्वों की चालों को समझे। बिना सच जाने किसी के बहकावे में न आएं, क्योंकि सरपंच का टूटता मनोबल असल में पूरे गांव के विकास का टूटना है।
