आपसी गुटबाजी और विरोधियों के हंगामे के कारण दब जाती है आम ग्रामीण की आवाज़; अब चुप रहने का नहीं, हक मांगने का समय है।


आपसी गुटबाजी और विरोधियों के हंगामे के कारण दब जाती है आम ग्रामीण की आवाज़; अब चुप रहने का नहीं, हक मांगने का समय है

भारतीय संविधान ने ‘पंचायती राज’ के रूप में सत्ता की चाबी सीधे जनता के हाथों में सौंपी थी। ग्राम सभा को गाँव की ‘संसद’ का दर्जा दिया गया, जहाँ हर नागरिक को अपने विकास का फैसला खुद करना था। लेकिन आज जमीनी हकीकत यह है कि अधिकांश ग्राम सभाएं गांव की विकास आपसी रंजिश, राजनीतिक गुटबाजी और विरोधियों के हंगामे की भेंट चढ़ जाती हैं। जब भी कोई आम ग्रामीण विकास या फंड पर सवाल उठाता है, तो विरोधी तत्व या दबंग लोग हंगामा करके बैठक को भंग करा देते हैं। इस व्यवधान का सबसे बुरा असर यह होता है कि सीधा-साधा ग्रामीण डर और निराशा के कारण बैठकों से दूरी बना लेता है, जिससे गाँव का विकास पूरी तरह ठप हो जाता है।

*डर और संकोच का माहौल*

गांवों में लोग एक-दूसरे से सामाजिक रूप से जुड़े होते हैं। हंगामे और गाली-गलौज के डर से आम ग्रामीण,विशेषकर महिलाएं और कमजोर वर्ग, खुलकर अपनी बात रखने से कतराते हैं।

!*जनता के नाम संदेश*

ग्रामीण भाइयों और बहनों को यह समझना होगा कि विरोधियों का हंगामा दरअसल उनकी कमजोरी है, आपकी नहीं। वे डरते हैं कि यदि आप जागरूक हो गए, तो उनका भ्रष्टाचार बंद हो जाएगा। ग्राम सभा आपकी अपनी अदालत है। यदि आप हंगामे से डरकर घर बैठ जाएंगे, तो आपके बच्चों के स्कूल, आपके गाँव की सड़कें और आपके हक का पानी कभी सही नहीं मिल पाएगा। विरोधियों के व्यवधान का जवाब लाठी या गाली नहीं, बल्कि आपकी भारी संख्या में उपस्थिति और शांतिपूर्ण ‘संवैधानिक सवाल’ हैं।


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