सब्जी से धान तक सेफ खेती की शुरुआत, बिलासपुर में बन रहा किसानों का ग्रीन हथियार

सब्जी से धान तक सेफ खेती की शुरुआत, बिलासपुर में बन रहा किसानों का ग्रीन हथियार

अंधाधुंध रासायनिक कीटनाशकों और फफूंदनाशकों के उपयोग से न केवल खेतों की मिट्टी और फसलें प्रभावित हो रही हैं, बल्कि इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर भी दिखाई देने लगा है. नर्वस सिस्टम की समस्याएं, त्वचा रोग, बच्चों में जन्म से जुड़ी बीमारियां और अन्य गंभीर दुष्प्रभाव लगातार सामने आ रहे हैं. इस गंभीर स्थिति को देखते हुए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय से संबद्ध ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर कृषि महाविद्यालय, बिलासपुर में जैविक रोगनाशी और जैविक कीटनाशकों का निर्माण किया जा रहा है, जो किसानों के लिए सुरक्षित, सस्ता और प्रभावी विकल्प बनकर उभर रहा है.

रासायनिक कीटनाशक बन रहे हैं मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा

कृषि रोग विशेषज्ञ डॉ. विनोद निर्मलकर ने बताया कि फसलों में रोग और कीट नियंत्रण के नाम पर रासायनिक दवाओं का अत्यधिक उपयोग किया जा रहा है. इसका दुष्प्रभाव अब मनुष्य में साफ दिखाई देने लगा है. नर्वस सिस्टम की गड़बड़ी, स्किन से जुड़ी समस्याएं और बच्चों में जन्म से संबंधित विकार लगातार बढ़ रहे हैं, जिनका एक बड़ा कारण रासायनिक कीटनाशक हैं.

सूक्ष्मजीवों से तैयार हो रहे जैविक कीटनाशी व रोगनाशी

डॉ. निर्मलकर के अनुसार ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर कृषि महाविद्यालय में पूरी तरह जैविक तरीके से कीटनाशी और रोगनाशी तैयार किए जा रहे हैं. इसमें मृदा में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों को एकत्र कर उनका संवर्धन किया जाता है. जैव रोगनाशी के रूप में स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस, ट्राइकोडर्मा और अन्य जीवाणुओं का उपयोग किया जा रहा है, जो फसलों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ पौधों की वृद्धि और अंकुरण में भी सहायक हैं.

धान से लेकर सब्जी और दलहन फसलों तक असरदार

छत्तीसगढ़ में धान की फसल में तना छेदक, पत्ती मोड़क और भूरा माहो जैसी समस्याएं आम हैं। इसके अलावा सरसों में माहो, सोयाबीन व अरहर में कीट प्रकोप, मूंगफली में विभिन्न कीड़े और सब्जियों में रस चूसक कीट भारी नुकसान पहुंचाते हैं। इन सभी के नियंत्रण के लिए जैविक कीटनाशी उपलब्ध हैं.

भूरा माहो और रस चूसक कीटों पर खास प्रभाव

भूरा माहो के नियंत्रण के लिए बेवेरिया बेसियाना बेहद कारगर है, जबकि रस चूसक कीटों के लिए वर्टिसिलियम का उपयोग किया जाता है. टमाटर और बैंगन में होने वाली लीफ कर्ल बीमारी, जिसे किसान चुर्रा-मुर्रा के नाम से जानते हैं, उसके लिए भी जैविक समाधान उपलब्ध है.

कम समय और ज्यादा कटाई वाली फसलों के लिए फायदेमंद

डॉ. निर्मलकर ने बताया कि भिंडी जैसी फसलों में 2 दिन के अंतराल पर तुड़ाई होती है, ऐसे में रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग नुकसानदायक होता है. जैविक कीटनाशी इन परिस्थितियों में बेहद उपयोगी हैं, क्योंकि इनका अवशेष फसलों पर नहीं रहता और उपभोक्ता के लिए सुरक्षित होता है.

किसानों को कम कीमत पर उपलब्ध

यह जैविक कीटनाशी और रोगनाशी इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय से संबंधित शाखाओं और ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर कृषि महाविद्यालय, बिलासपुर में रासायनिक दवाओं की तुलना में कम कीमत पर उपलब्ध हैं. इससे किसानों की लागत घटेगी और स्वास्थ्य व पर्यावरण दोनों सुरक्षित रहेंगे.


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *