राजनीतिक द्वेष और मानसिक प्रताड़ना का शिकार बनते ग्रामीण जनप्रतिनिधि
राजनीतिक द्वेष और मानसिक प्रताड़ना का शिकार बनते ग्रामीण जनप्रतिनिध

ग्रामीण लोकतंत्र की सबसे बुनियादी और मजबूत कड़ी ‘सरपंच’ का पद होता है। एक सरपंच पर पूरे गांव के विकास, न्याय और प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी होती है। लेकिन हाल के वर्षों में ग्रामीण राजनीति का स्तर बेहद चिंताजनक रूप से गिरा है। चुनावी रंजिश और राजनीतिक द्वेष के कारण विरोधियों द्वारा सरपंचों, विशेषकर महिला या सीधे-सरल पृष्ठभूमि से आने वाले जनप्रतिनिधियों की छवि खराब करने और उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का एक खतरनाक चलन शुरू हो गया है।
अक्सर देखा जाता है कि चुनाव हारने वाले या स्थानीय विरोधी गुट सरपंच के अच्छे कामों को भी नकारात्मक रूप से पेश करते हैं। गांव के चौपालों, चाय की दुकानों और अब सबसे घातक हथियार बन चुके सोशल मीडिया पर सरपंच के खिलाफ झूठी अफवाहें फैलाई जाती हैं। बिना किसी तथ्य या प्रमाण के भ्रष्टाचार के मनगढ़ंत आरोप लगाना, उनके चरित्र पर कीचड़ उछालना और पारिवारिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाना विरोधियों का मुख्य हथियार बन चुका है। आरटीआई (सूचना का अधिकार) का दुरुपयोग कर विकास कार्यों में अड़ंगा लगाना और आए दिन झूठी शिकायतें करके प्रशासनिक अधिकारियों के चक्कर कटवाना भी मानसिक उत्पीड़न का एक बड़ा जरिया बन गया है।
इस प्रकार का सुनियोजित मानसिक तनाव न केवल एक जनप्रतिनिधि के काम करने के हौसले को तोड़ता है, बल्कि उनके व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन को भी अशांत कर देता है। जब एक सरपंच हर समय अपनी बेगुनाही साबित करने और मानसिक दबाव से निपटने में उलझा रहेगा, तो वह गांव के विकास पर ध्यान कैसे केंद्रित कर पाएगा? इसका सीधा नुकसान पूरे गांव और वहां के विकास कार्यों को भुगतना पड़ता है।
यह समय है कि ग्रामीण समाज इस गंदी राजनीति को समझे। विरोध और आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन यह रचनात्मक और तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए, न कि किसी के मानसिक उत्पीड़न और चरित्र हनन का जरिया। प्रशासन को भी चाहिए कि सरपंचों के खिलाफ आने वाली शिकायतों की निष्पक्ष और त्वरित जांच करे, ताकि झूठे आरोपों के सहारे प्रताड़ित करने वाले तत्वों के हौसले पस्त हो सकें। स्वस्थ ग्रामीण विकास के लिए जनप्रतिनिधियों को भयमुक्त और सम्मानजनक माहौल मिलना बेहद जरूरी है।
