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दो दिन में ही बिहार में खेला कर गए चाणक्य, इसीलिए अमित शाह को कहते हैं सियासत का सबसे बड़ा उस्ताद - Somanshu News

दो दिन में ही बिहार में खेला कर गए चाणक्य, इसीलिए अमित शाह को कहते हैं सियासत का सबसे बड़ा उस्ताद

दो दिन में ही बिहार में खेला कर गए चाणक्य, इसीलिए अमित शाह को कहते हैं सियासत का सबसे बड़ा उस्ताद

टना: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को भाजपा का चुनावी चाणक्य माना जाता है। उनकी मेहनत और सोची-समझी रणनीति 2014 से लगातार दिख रही है। 2014 के बाद राज्यों में भाजपा शासित सरकारों की संख्या बढ़ती चली गई।

पूर्वोत्तर राज्यों में भी भाजपा ने गहरी पैठ बनाई है, इसके पीछे शाह की रणनीति रही है। 2015 में जब बिहार एनडीए के हाथ से निकल गया था, तब अमित शाह ने नीतीश कुमार को रिझाकर महज दो साल बाद ही महागठबंधन की सरकार का अंत कर दिया था।

अमित शाह कह चुके हैं कि इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए वह बिहार में ही डेरा डालेंगे। चुनावी साल में उन्होंने दो दिनों का बिहार दौरा भी किया है। अलग-अलग बैठकों और बातचीत में उन्होंने भाजपा के साथ ही एनडीए में शामिल दलों के नेताओं को भी जीत का मंत्र दिया है। चुनाव के नेतृत्व पर भी उन्होंने अपनी बात साफ कर दी है। नीतीश कुमार के नाम पर मुहर लगाकर उन्होंने जेडीयू को भी राहत दी है। इस बार उन्होंने एनडीए को 243 में से 225 सीटें जीतने का टास्क दिया है।

यूपी में दिखाया करिश्मा

अमित शाह की कुशल चुनावी रणनीति पहली बार उत्तर प्रदेश में देखने को मिली थी। 2013 में जब बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को पीएम चेहरा बनाने का फैसला किया तो उनके आग्रह पर तत्कालीन पार्टी प्रमुख राजनाथ सिंह ने अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी महासचिव बनाया। अमित शाह ने बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत किया। इसका नतीजा 2014 के लोकसभा चुनाव में सामने आया। बीजेपी ने उत्तर प्रदेश की 80 संसदीय सीटों में से 71 पर जीत दर्ज की।

बीजेपी की यह बेमिसाल जीत 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव का आधार बनी। यूपी की कमान समाजवादी पार्टी के हाथ से फिसल गई। योगी आदित्यनाथ राज्य के सीएम बन गए। अगर यूपी की जनता ने योगी के काम और 2022 में नरेंद्र मोदी के नाम पर बीजेपी को दोबारा बहुमत दिया तो बूथ स्तर पर अमित शाह द्वारा तैयार किए गए संगठनात्मक ढांचे की भूमिका भी कम नहीं रही।

सबसे ज्यादा सक्सेज रेट

अमित शाह जो भी फैसला करते हैं, उन्हें ज्यादातर मामलों में सफलता मिलती है। उनके काम करने का तरीका दूसरों से अलग है। वह जो काम करने जा रहे हैं, उसे करने से पहले उसका बहुत बारीकी से अध्ययन करते हैं। गृह मंत्रालय के मुखिया होने के नाते उनके लिए दूसरों की कमियों और कमजोरियों का पता लगाना मुश्किल नहीं है। इसे समझने के लिए हमें एक दशक पीछे जाना होगा। गुजरात में राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव होने थे। तब सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल कांग्रेस कोटे से उम्मीदवार थे। उनकी जीत को लेकर कोई संदेह नहीं था।

अमित शाह की रणनीति ने अहमद पटेल का खेल बिगाड़ दिया। हुआ यह कि भाजपा ने कांग्रेस के एक विधायक को अपना उम्मीदवार बना दिया। उनके समर्थन में कांग्रेस के 6 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया। विधायकों में मची भगदड़ को रोकने के लिए कांग्रेस ने बचे हुए विधायकों को कर्नाटक भेज दिया। कर्नाटक में जिस व्यक्ति के वे मेहमान बने, केंद्रीय एजेंसियों ने उसी के दरवाजे पर दस्तक दी। अमित शाह की रणनीति ऐसी है, जिसके कारण लोग उन्हें चुनावी चाणक्य कहते हैं।

बिहार में डेरा डालेंगे अमित शाह

बिहार में अमित शाह की रणनीति कितनी कारगर होती है, यह तो चुनाव नतीजों के बाद ही पता चलेगा। हालांकि, अमित शाह के बिहार में डेरा डालने के ऐलान से यह जरूर संकेत मिलता है कि उन्होंने इस बार भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार बनाने का संकल्प ले लिया है। उनकी सफलता में संदेह की गुंजाइश सिर्फ इतनी है कि बंगाल में तमाम तरह की रणनीति के बावजूद भाजपा 2021 में ममता बनर्जी का कुछ नहीं बिगाड़ पाई। हालांकि, शाह की ऐसी विफलता के उदाहरण ज्यादा नहीं, बल्कि गिने-चुने ही हैं।

ज्यादातर मामलों में वे सफल रहे हैं। वे पहले ही संकेत दे चुके हैं कि बिहार की अगली सरकार भाजपा के नेतृत्व में ही बनेगी। उन्होंने एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में कहा था कि चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ा जाएगा, लेकिन सीएम चेहरा संसदीय बोर्ड की बैठक में तय होगा। शनिवार को पटना में भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ बैठक में उन्होंने दोहराया कि एनडीए नीतीश के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगा। लेकिन, अगला सीएम कौन होगा, इस पर वे चुप्पी साध गए।

शाह के आने से डरी राजद!

अमित शाह ने बिहार का दरवाजा खटखटाया है। अब वे विधानसभा चुनाव तक बिहार पर खास नजर रखेंगे। बताया जा रहा है कि वे बिहार में ही कैंप करेंगे। संभव है कि चुनाव में कुछ महीने बचे हैं तो उनके बिहार आने का सिलसिला बढ़ सकता है। कैंप करने में संदेह है, क्योंकि उनके पास कई मंत्रालयों की जिम्मेदारी है। उन्होंने दो दिन बिहार में रहकर सबको चौंका दिया। महागठबंधन को डर था कि वे विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) सुप्रीमो मुकेश सहनी को शिफ्ट कर सकते हैं। गौरतलब है कि मुकेश सहनी को लोकसभा चुनाव से पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने वाई प्लस सुरक्षा मुहैया कराई थी।

तब भी चर्चा थी कि सहनी एनडीए में वापस आ सकते हैं। भाजपा नेताओं या एनडीए सहयोगियों से इस पर कोई चर्चा होने की जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन अभी हम पक्के तौर पर नहीं कह सकते। सहनी फिलहाल महागठबंधन में राजद के भरोसेमंद सहयोगी हैं। जदयू नेताओं को डर था कि वे नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर कोई अप्रिय फैसला न सुना दें। हालांकि शाह ने अब सभी को आश्वस्त किया है कि चुनाव तक कोई खतरा नहीं है। चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा।

चुनाव के साथ भी चुनाव के बाद भी

अगर अमित शाह बिहार पर नजर रख रहे हैं तो तीन चीजें हो सकती हैं। पहला, विपक्ष में दरार पड़ जाए। वीआईपी को महागठबंधन से अलग कर दिया जाए। यह उनकी चुनाव पूर्व प्राथमिकता होगी। इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण काम वे कर सकते हैं कि कैसे भाजपा की शर्तों पर सहयोगियों को टिकट के लिए राजी किया जाए।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बिहार के जिन छह लोगों के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम ने छापेमारी की और 11 करोड़ रुपये से ज्यादा नकदी बरामद की, वे सभी नीतीश कुमार के करीबी थे। इसमें भवन निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता तारिणी प्रसाद भी शामिल हैं, जिन्हें नीतीश सरकार ने एक्सटेंशन दिया था। इसे जेडीयू पर बीजेपी की मांग को चुपचाप स्वीकार करने के दबाव के तौर पर देखा जा रहा है।

अमित शाह को चुनाव बाद की रणनीति का भी माहिर माना जाता है। महाराष्ट्र में शिंदे को मनाने में शाह की भूमिका रही। शाह का करिश्मा जम्मू-कश्मीर में भी देखने को मिला, जब 2014 में बीजेपी पीडीपी की अगुआई वाली सरकार में शामिल हुई थी।


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